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Sunday 10 January 2010

अर्ज़ भगवान से ये है

अर्ज़ भगवान से ये है किसी दिन गर सुने मेरी 
तुम्हारी आँख का पानी हथेली पर गिरे मेरी 


कभी मैं सोचता हूँ आपबीती लिख रखूँ अपनी 
बला से दास्ताँ दुनिया पढ़े या ना पढ़े मेरी 


सितमगर का कभी तो हाल ऐसा कर मेरे मौला 
कभी रोते बिलखते वो कहानी खुद कहे मेरी 


वतन के ही लिए हर सांस मेरी देश की खातिर 
लहू की या पसीने की सदा धारा बहे मेरी 


मुझे तक़लीफ़ दे ग़म दे मुसीबत दे मगर मालिक 
मुझे रुसवां न कर संसार में इज्ज़त रहे मेरी 


अदब से सर झुकाऊँ मैं सभी को और ये चाहूँ 
किसी के सामने नज़रें नहीं हरगिज़ झुके मेरी 


उठा कर बोझ "जोगेश्वर" न सीने पर रखो इतना 
कभी धड़कन ठहरती है कभी सांसें रुके मेरी 

4 comments:

Udan Tashtari said...

कभी मैं सोचता हूँ आपबीती लिख रखूँ अपनी
बला से दास्ताँ दुनिया पढ़े या ना पढ़े मेरी

-बहुत खूब!!

Center for Media Research & Development said...

अदब से सर झुकाऊँ मैं सभी को और ये चाहूँ
किसी के सामने नज़रें नहीं हरगिज़ झुके मेरी

kya khoob kaha hai, par log to chahte hain ke aap pet ke bal letkar
nazroon ko zameen main gada den.

naresh said...

Prem Srdhye,
Sh Jogeswar ji,
Nameskar,
kabhi derken therti h. kabhi sanse ruke nahi.Arj bhegwan s h.bhut hi payri ghazal legi.behtrin ghazal k liye Aap ko sadhu-bad.
NARESH MEHAN
HANUMANGARH JN

आओ बात करें .......! said...

अदब से जो सर झुका रहेगा
न धड़कन थकेंगी
न साँसें रुकेंगी
न आंसू बहेगा
न बोझ रहेगा
'जोग' का योग ईश्वर से बना रहेगा.

आशा है कि अगली पोस्ट में लोकशाही में भगवानतुल्य 'वोटर' के नाम आपका शब्दार्पण पढ़ने को मिलेगा.