
कल उन्हों ने मेरी वाल पर एक ग़ज़ल चिपकाई और प्रतिक्रिया माँगी.
ये रही उनकी ग़ज़ल :
दर्द जब बेजुबान होता है
जिस्म पूरा बयान होता है
आदमी किश्त किश्त जीता है
सब्र का इम्तिहान होता है
कौन सी हद औ किस के पैमाने
एक सपना जवान होता है
शख्श एक हौसले से जीता है
आँख में असमान होता है
वक़्त है आम खास क्या होगा
सिर्फ एक दास्तान होता है
जुगनुओं को करीब से देखो
इस चमक में जहान होता है
आदमी बदगुमान होता है
हर शिखर का ढलान होता है
दर्द जब भी जवान होता है
सब्र का इम्तेहान होता है
घाव दिल पर लगे बहुत गहरा
शक्ल पर कब निशान होता है
हो न अहसास से भरा दिल तो
जिस्म खाली मकान होता है
खूब हो माल ज़र जमीं दौलत
कौन इनसे महान होता है
ख्वाब लाखों तबाह होते हैं
जिस्म जब भी दुकान होता है
खुशनसीबी अगर हमारी हो
आदमी से मिलान होता है
ढूँढते है सभी कमी मुझ में
कब गलत आसमान होता है
है तभी कामयाब "जोगेश्वर"
तू अगर मेहरबान होता है
आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी.