
कल उन्हों ने मेरी वाल पर एक ग़ज़ल चिपकाई और प्रतिक्रिया माँगी.
ये रही उनकी ग़ज़ल :
दर्द जब बेजुबान होता है
जिस्म पूरा बयान होता है
आदमी किश्त किश्त जीता है
सब्र का इम्तिहान होता है
कौन सी हद औ किस के पैमाने
एक सपना जवान होता है
शख्श एक हौसले से जीता है
आँख में असमान होता है
वक़्त है आम खास क्या होगा
सिर्फ एक दास्तान होता है
जुगनुओं को करीब से देखो
इस चमक में जहान होता है
आदमी बदगुमान होता है
हर शिखर का ढलान होता है
दर्द जब भी जवान होता है
सब्र का इम्तेहान होता है
घाव दिल पर लगे बहुत गहरा
शक्ल पर कब निशान होता है
हो न अहसास से भरा दिल तो
जिस्म खाली मकान होता है
खूब हो माल ज़र जमीं दौलत
कौन इनसे महान होता है
ख्वाब लाखों तबाह होते हैं
जिस्म जब भी दुकान होता है
खुशनसीबी अगर हमारी हो
आदमी से मिलान होता है
ढूँढते है सभी कमी मुझ में
कब गलत आसमान होता है
है तभी कामयाब "जोगेश्वर"
तू अगर मेहरबान होता है
आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी.
6 comments:
sirji bahut achche sahityakar ki tarah likhte ho
घाव दिल पर लगे बहुत गहरा
शक्ल पर कब निशान होता है
ya ye bhee kah sakte hain
ghaav dil par lage bahut gahara.
to dard aankhon se bayan hota hai..
घाव दिल पर लगे बहुत गहरा
शक्ल पर कब निशान होता है
ya youn bhee kah sakte hain
ghaav dil par lage bahut gahara
dard aankhon se bayan hota hai
वक़्त है आम खास क्या होगा
सिर्फ एक दास्तान होता है
जुगनुओं को करीब से देखो
इस चमक में जहान होता है
..bahut khoobsurat gajal...badhai
जानदार और शानदार खबरों की प्रस्तुति हेतु आभार।
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इस दोहे का रसास्वादन कीजिए।
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शहरीपन ज्यों-ज्यों बढ़ा, हुआ वनों का अंत।
गमलों में बैठा मिला, सिकुड़ा हुआ बसंत॥
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कुछ स्फुट शेर प्रेषित.....
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दर्द जब बेजुबान होता है।
चित्त में इक उफान होता है॥
मंच से गिरता है वही अक्स्रर-
जो नहीं सावधान होता है॥
उनको लगता है खास कुछ भी नहीं-
बस एलेक्शन प्रधान होता है॥
सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी
ग़ज़ल और प्रतिक्रिया, दोनों ही खूबसूरत हैं।
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