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Saturday 13 March 2010

कभी तोड़ा कभी छोड़ा

कभी तोड़ा कभी छोड़ा कभी छेड़ा बहाने से 
हमारा दिल कभी हटता नहीं उनके निशाने से 



इसी उम्मीद पर देता रहा हूँ हर परीक्षा मैं 
कभी तो बाज आयेगा मुझे तू आजमाने से 


खुशी के साथ सह लूंगा सितमगर मैं सितम तेरे 
अगर आनंद मिलता हो तुझे मुझको सताने से 


कभी उठना कभी गिरना कभी गिर कर सम्भलना भी 
बहुत अनुभव बटोरे हैं ज़िंदगी के खजाने से 


नदी को रोकिये मत पहुँचने दीजे समंदर तक 
मिलेंगे कीमती मोती मुहब्बत के मुहाने से 


भरम फैले अगर तो कीजिये क्या रोकिये कैसे 
कभी तेरी हकीकत से कभी मेरे फ़साने से 


कहोगे क्या कि "जोगेश्वर" यहाँ पर किसलिए आया 
मिलेगी लाश गर उसकी कभी तेरे ठिकाने से 

2 comments:

Mithilesh dubey said...

वाह क्या बात है , बेहतरीन लगी रचना बधाई स्वीकार्य करें ।

वीनस केशरी said...

कभी तोड़ा कभी छोड़ा कभी छेड़ा बहाने से
हमारा दिल कभी हटता नहीं उनके निशाने से


वाह वाह, जोगेश्वर जी मत्ले के साथ आपने जो समां बांधा उसका नशा मकते तब कायम रहा
एक मुकम्मल और कामयाब गजल के लिए बधाई

- वीनस