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Monday 26 April 2010

जल प्रदूषित और ज़हरीली हवाएं देखिये

जल प्रदूषित और ज़हरीली हवाएं देखिये 
और फिर उनके बयानों की अदाएं देखिये 

मूक दर्शक बन खडा है आदमी जो आम है 
शोक की या शौक़ की सारी सभाएं देखिये 

वस्त्र की जो ओट है तन पर उसे भी चीर कर 
भेड़िये सी ताकती भूखी निगाहें देखिये 

 क्रोध हो अपमान हो या ईर्ष्या या द्वेष हो 
रोज तिल तिल कर जलाती ये चिताएं देखिये 

जो सबल हैं और सक्षम उनके हर अपराध की 
मिल रही है बेगुनाहों को सजायें देखिये 

पा गए सब कुछ मगर फिर भी जुगाड़ों में जुटे 
सब्र करने की हमें उनकी सलाहें देखिये 

वृक्ष "जोगेश्वर" अगर कटते गए कटते गए 
कब तलक रह पायेंगी दिलकश फिजायें देखिये 

5 comments:

वीनस केशरी said...

जो सबल हैं और सक्षम उनके हर अपराध की
मिल रही है बेगुनाहों को सजायें देखिये

पा गए सब कुछ मगर फिर भी जुगाड़ों में जुटे
सब्र करने की हमें उनकी सलाहें देखिये

वृक्ष "जोगेश्वर" अगर कटते गए कटते गए
कब तलक रह पायेंगी दिलकश फिजायें देखिये


बहुत खूबसूरत मकता
सुन्दर सन्देश देती गजल

Udan Tashtari said...

वाह!! बहुत बेहतरीन..आनन्द आया.

Rajendra Swarnkar said...

हरि ओम !
अच्छी सधी हुई शब्दावली में , बहर को निभाते हुए बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने , जोगेश्वरजी !
वर्तमान का सच्चा चित्रण किया है …

"जो सबल हैं और सक्षम उनके हर अपराध की
मिल रही है बेगुनाहों को सजायें देखिये"

बधाई !

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

prasangik...behad achhi ghazal ...

किरण राजपुरोहित नितिला said...

जो सबल हैं और सक्षम उनके हर अपराध की
मिल रही है बेगुनाहों को सजायें देखिये!


बहुत सटीक बयान ,देश की व्यवस्था पर .