
गौरी से जो सिलसिला शुरू हुआ वह आगे भी जारी रहा. गौरी जैसे ही परित्यक्त, पीड़ित, प्रताड़ित बच्चों को वह अपने घर में आश्रय देती गयी. बहुत बाधाएं आयी. अपनों का और पड़ोसियों का विरोध भी सहना पडा. पर इस कार्य में उनके पति सुरेन्द्र ने पूरा सहयोग किया. इस कार्य को विधिसम्मत तरीके से चलाने की सारी कवायद उन्हों ने ही की.
तमाम बाधाओं, अवरोधों, कठिनाइयों और मुसीबतों के बावजूद सुरेन्द्र का "सुर" और मनन का "मन" मिल कर बना "सुरमन" संस्थान उन बच्चों को अपना बनाने के भागीरथी प्रयत्न में लगा है जिनका इस संसार में कोई नहीं है. आज "सुरमन" ६६ बच्चों का आशियाना है और सुरेन्द्र-मनन स्वयं को उन ६६ बच्चों के पिता एवं माता कहते हुए अघाते नहीं हैं. मजे की बात ये कि किसी भी अनजान व्यक्ति के लिए यह जानना बहुत मुश्किल है कि उनमे से वे तीन बच्चे कौन से हैं जो मनन की कोख से पैदा हुए हैं.
गत १७ नवम्बर को मनन का जन्मदिन था. मैंने बधाई दी तो बोली मेरी गिफ्ट ? मैंने कहा क्या चाहिए ? बोली एक ग़ज़ल ऐसी जिसे पढ़ कर मैं यह अनुमान लगा सकूं कि मेरा भाई मुझे कितना समझ पाया है.
मांग साधारण नहीं थी. पर बहिन ने मांग की है तो पूरी तो करनी ही थी. जो ग़ज़ल मैंने मनन के लिए लिखी वह हू-ब-हू आप की सेवा में प्रस्तुत है.
जमीं पर राज तेरा हो हुकूमत में गगन तेरा
चमेली से गुलाबों से सदा महके चमन तेरा
मुसीबत से तेरा लड़ना, झगड़ना हर बुराई से
क़यामत तक रखे कायम खुदा ये बांकपन तेरा
जनमते ही जिसे छोड़ा, नसीबों ने जिसे मारा
उन्हें भी छाँव ममता की मिले हर पल जतन तेरा
न अपना है तेरा अपना, न कोई भी पराया है
खुदी तूने मिटा डाली न तन तेरा न मन तेरा
न फुर्सत है न आलस है न नफ़रत को जगह कोई
लुटाने को मुहब्बत ही हुआ है आगमन तेरा
सुरों का इन्द्र जब पहुंचा मनन के द्वार पर आकर
सजा सुरमन बढ़ा सुरमन बना सुरमन वतन तेरा
चिरंतन सोच सेवा की लिए चलना निरंतर तू
करेंगे सब मदद तेरी सुनेंगे सब कथन तेरा
तुम्हारे जन्मदिन पर आज "जोगेश्वर" दुआ मांगे
रहेगा नाम हर पल ही बुलंदी पर "मनन" तेरा
5 comments:
badhai
पहली चीज तो यह अच्छी लगी कि एक नेता पढ़ा लिखा है, जागरुक है...
ईमानदारी की बात अभी यहीं छोड़ दी जाती है...
क्योंकि नेता का पढ़ा लिखा होना ही अच्छी बात है..
दूसरा यह कि नेता के अन्दर एक अच्छा प्राणी छिपा प्रतीत हो रहा है...
रचना बहुत अच्छी है और लेखन शैली भी...
धन्यवाद जी !
परम प्रिय जोगेश्वर जी
नमस्कार !
पहले इस शानदार ग़ज़ल को पढ़ कर जा चुका हूं , किसी कारणवश कमेंट रह गया था ।
इस बहाने एक ख़ूबसूरत रचना और
६६ बच्चों के पिता - माता सुरेन्द्रजी और मननजी के बारे में दुबारा पढ़ने का सौभाग्य मिला । प्रणाम है इन विभूतियों को !
और आपकी लेखनी का भी क्या कहना … कमाल है ! पूरी ग़ज़ल भाव के दृष्टिकोण से जितनी श्रेष्ठ और बुलंद है , उतनी ही शिल्प के दृष्टिकोण से भी … !
एक एक शे'र पढ़ते हुए आपकी लेखनी को नमन किया है पूरे मन से ! वाह वाऽऽह !
………
यहां पूरी ग़ज़ल को उद्धृत मानें !
………
पुनः श्रेष्ठ रचना और मानवीयता के लिए आभार और बधाई !
१७ नवम्बर को मननजी का जन्मदिन था … विलंब से ही सही मेरी तरफ़ से भी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !
- राजेन्द्र स्वर्णकार
सुरमन के रूप में सुरेन्द्र जी और मनन का जीवन सार्थक हो गया और आपने जिस तरह उनके लिये दुआ मॉंगी है वह ईश्वर को कबूल हो, ऐसा ही हो।
Post a Comment