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Saturday 29 May 2010

जैसे ख्वाब दिखाए तूने

जैसे ख्वाब दिखाए तूने वैसी अब ताबीरें दे
मेरी आँखों में बस जाए ऐसी कुछ तस्वीरें दे

और मुझे कुछ दे या ना दे मौला तेरी मर्जी है
दानिशमंदी की दौलत दे हिम्मत की जागीरें दे

राम भरोसे मुल्क हमारा जो होगा अच्छा होगा
नेता से उम्मीद यही बस अच्छी सी तक़रीरें दे

जब चाहूँ तब बातें तुझसे जब चाहूँ दीदार तेरा
मेरे हाथों में भी मालिक ऐसी चंद लकीरें दे

मेरे हिस्से की खुशियाँ सब मेरे अपनों में बांटो
और मुझे झोली भर-भर के उन अपनों की पीरें दे

जीवन के इस महा समर में अभी बहुत लड़ना बाकी
दिल में खूब हौसला भर दे हाथों में शमशीरें दे

मन तेरा चंचल "जोगेश्वर" इसे भटकने से रोको
तगड़े-तगड़े ताले जड़ दे मोटी-सी जंजीरें दे

5 comments:

राजेन्द्र मीणा said...

क्या बात है ,,,वाह ! फिर से तीर निशाने पर ....बहुत खूब ....

माधव said...

nice

उम्मेद गोठवाल said...

जज्बातों को बयां करती बेहतरीन गजल...नेताओं से तकरीरे, हाथ में चन्द लकीरे, अपनों की पीरें,मन में हौसला हाथ में शमशीर,चंचल मन के लिए ताले व जंजीर.....कितना तारत्म्य व गजब का सौन्दर्य निहित है इनमें.....नया भाव-बोध व नये सौन्दर्य-बोध के साथ मानवीय मूल्यों की तलाश में हृद्य की गहराई से निकली बेहतरीन गजल...शुभकामनाएं.....अपना श्रेष्ठ सृजन अनवरत रखे।

Shekhar Kumawat said...

मेरे हिस्से की खुशियाँ सब मेरे अपनों में बांटो


yaha dil le liya aap ne hamara

ab wah ! wah ! wah ! wah ! hi kaha ja sakta he

वीनस केशरी said...

राम भरोसे मुल्क हमारा जो होगा अच्छा होगा
नेता से उम्मीद यही बस अच्छी सी तक़रीरें दे

बहुत खूब

मक्ता भी बहुत पसंद आया

97 :)