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Tuesday 24 March 2009

इतनी सी यह बात

इतनी सी यह बात समझ लें हंगामा करने वाले
कोस-कोस कौए मर जाएँ बैल नहीं मरने वाले

देखे हैं क्या कभी किसीने उनके नाम शहीदों में
कायरता का जीवन जी कर पग-पग पर मरने वाले

चोर-उचक्के-डाकू-गुंडे घर के मालिक बन बैठे
कितने गाफिल होंगे घर की रखवाली करने वाले

उनके चारों तरफ़ अनेकों लोग खड़े दीवाने-से
ना पर शीश हिलाने वाले हाँ पर हाँ भरने वाले

उस मिट्टी से मेरा रिश्ता होना कैसे सम्भव है
जिस मिट्टी से बनते होंगे समझौते करने वाले

अपनी हर पसली वाकिफ है "जोगेश्वर" उन लोगों से
आगे बढ़ कर बहुत जोश से बाहों में भरने वाले

1 comment:

शोभित जैन said...

इतनी सी यह बात समझ लें हंगामा करने वाले
कोस-कोस कौए मर जाएँ बैल नहीं मरने वाले

मिट्टी की खुश्बू से ओतप्रोत एक खूबसूरत नज़्म