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Wednesday 15 April 2009

बिचारा आदमी

बिचारा आदमी रोये कहाँ यारों
भरोसेमंद अब कंधे कहाँ यारों

हथेली सख्त पत्थर हो गयी मेरी
नयी रेखा भला उभरे कहाँ यारों

पुराने दरख्तों की डाल जैसी है
पुरानी आदतें बदले कहाँ यारों

पता हो तो बतादो पार्लर कोई
हमारी सूरतें संवरे कहाँ यारों

खुशी की धुप को आँगन खुला तो दो
की फैले तो कहाँ बिखरे कहाँ यारों

बिछे हैं मुश्किलों के शूल बिस्तर पर
की "जोगेश्वर" अभी सोये कहाँ यारों


2 comments:

नीरज गोस्वामी said...

खुशी की धुप को आँगन खुला तो दो
की फैले तो कहाँ बिखरे कहाँ यारों
बेहतरीन शेर है...और पूरी ग़ज़ल ही उम्दा है....आपको पढ़कर बहुत अच्छा लगा..
नीरज

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया गज़ल है।बधाई।