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Tuesday, 5 May, 2009

कहता तो हूँ

कहता तो हूँ पांडवों की ही कथा मित्रों
तुम पर मुझ पर भी यही तो है घटा मित्रों

जो जीता हो गया सिकंदर हारे को हरि नाम
सदियों से चलता रहा यह सिलसिला मित्रों

गंदा नाला गंगा में मिल गंगा बनता था
आजकल ख़ुद गंगा की हालत खस्ता मित्रों

दिन भर भटके मधुमक्खी पर शहद नहीं मिलता
नक़ली फूलों ने कर डाला यह धोखा मित्रों

1 comment:

Udan Tashtari said...

पढ़ कर पोस्ट मजा, आ गया मुझको,
वरना क्यूँ कर मैं भला टिपयाता मित्रों.

--बेहतरीन!!