Subscribe

RSS Feed (xml)

Powered By

Skin Design:
Free Blogger Skins

Powered by Blogger

Tuesday 12 May 2009

अजीब हैं

अजीब हैं हुज़ूर तो अजीब ये विचार है 
कि हर तरफ जहान में खुशी अमन करार है

तपाइए न और अब मुझे मुआफ कीजिये  
लहू गरम नहीं हुआ ज़नाब ये बुखार है

लहूलुहान खच्चरों कहो कि फर्क क्या लगा
लदा हुआ लगेज है कि आदमी सवार है

न कीजिये सितम न ज़ुल्म तालिबानियों सुनो  
कि हुश्न को हुज़ूर अब नकाब नागवार है

नशा नहीं किया हुआ न होश हैं उडे हुए  
कि एक लफ्ज़ इश्क का खुमार बेशुमार है

गुज़र गयी तमाम उम्र सोचते तलाशते  
मेरे लिए भी क्या कोई उदास बेकरार है

3 comments:

sanjaygrover said...

हुज़ूर आपका भी .......एहतिराम करता चलूं .....
इधर से गुज़रा था, सोचा, सलाम करता चलूं ऽऽऽऽऽऽऽऽ



कृपया एक व्यंग्य को पूरा करने में मेरी मदद करें। मेरा पता है:-
www.samwaadghar.blogspot.com
शुभकामनाओं सहित
संजय ग्रोवर
samvadoffbeat@yahoo.co.in

संगीता पुरी said...

बहुत खूब !!

Udan Tashtari said...

तपाइए न और अब मुझे मुआफ कीजिये
लहू गरम नहीं हुआ ज़नाब ये बुखार है

-बहुत खूब!!